Sep, 22, 2019
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Women’s Day Special : जानें महिलाओं की कुछ ख़ास तकलीफें और करें उनका निदान..

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Women’s Day Special : हर साल 8 मार्च को महिला दिवस मनाया जाता है, इसकी शुरुआत 8 मार्च 1975 को पहली बार की थी। कहने को तो हम सब बधाई दे तो देते है पर क्या हम दिल से उनकी किसी तकलीफ को दूर करने की कोशिश करते है? महिलाओ को किन बातो से तकलीफ होती है इस बात को हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते है। हमारे आस पास हमारी जिंदगी की हर मोर, हर एक पल किसी न किसी महिला से जुड़ी होती है। हमे धरती पे जन्म देने से लेकर हमारे मरने तक हम औरतो से जुड़े होते है। जब जन्म लेते है तो माँ से, वो भी एक औरत है, जब आपको पापा की डांट पड़ती है तो आपको बहन प्रोटेक्ट करती है, जब आप शादी करते हो लड़की की भूमिका अहम होती है, जो अपना सब कुछ छोर कर आपके घर आकर आपको अपनाती है। पर अक्सर लोग क्या करते है बीबी आ गई तो माँ और बहन की केयर करनी ख़त्म हो जाती है, या फिर जहा आप माँ बाप का केयर करते है तो पत्नी को उनका महत्व नहीं देते है।

उससे भी बड़ी बात है कि अभी भी दहेज़ की मांग ख़त्म नहीं हुई है, सरकार ने कानून तो बना दिया पर ये घिनौना प्रथा अब तक ख़त्म नहीं हुआ है। जितने आमिर लोग उतनी बड़ी मांग होती है। जब कही शादी तय होती है तो लड़के वाले इस तरह दहेज़ की मांग करते है मनो उन्होंने ही लड़के को पालने – पोषने में दिक्कतों का सामना किया हो, लडकियो को तो पेड़ से तोर के लाया गया हो, उन्हें पालने – पोषने में तो खर्च होता ही नहीं है। इस समय लडकियो पे क्या बीतती है उसका अंदाज तो वही लगा सकती है. दहेज़ और बलात्कार जैसी समस्याओ के कारण अभी भी लोग बेटियों के जन्म से डरते है। 

मै अपनी इस बात को एक कविता के माध्यम से रखना चाहूंगी जो मैंने खुद बनाया है एक बार जरूर पढ़े और अपनी राय  दे :-


एक बार एक कवी नदी किनारे बैठा था, तभी एक लड़की का शव पानी में तैरते नज़र आया, तब कवी ने उस शव से पूछा – कौन हो तुम ओ सुकुमारी, बह रही नदिया के जल में, कोई होगा तेरा अपना, मानव निर्मित इस भूतल में ? किस धरती पर तुम रहती हो, किस क्यारी की कली हो तुम ? किसने तुमको छाला है बोलो, क्यों दुनिया छोड़ चली हो तुम ? किसके नाम की मेहँदी बोलो, हाथो पर रची है तेरे ? बोलो किसके नाम की बिंदिया, माथे पर सजी है तेरे ? लगती हो तुम राजकुमारी, या देव् लोक से आई हो ? उपमा रहित ये रूप तम्हारे, ये रूप कहा से पाई हो ?

कवी की बाते सुन लड़की की आत्मा बोलती है – कविराज मुझको क्षमा करो, गरीब पिता की बेटी हु। इसलिए मृतमिन की भांति, जलधारा पे लेटी हु। रूप – रंग और सुंदरता, मेरी यह पहचान बताते है। चुरी, कंगन, बिंदी, मेहँदी, सुहागन मुझे बनाते है। पिता के दुःख को दुःख समझा, उनकी दुःख में दुखी थी मै, जीवन के इस पावन पथ पर, पति के संग चली थी मै। पति को मैंने दीपक समझा, उसकी लॉ में जली थी मै। माता पिता का साथ छोड़, उसके रंग में ढली थी मै। पर वो निकला सौदागर, लगा दिया मेरा भी मोल। दौलत और दहेज़ के खातिर, पीला दिया जल में विष घोल। दुनिया रूपी इस उपवन में, एक छोटी सी कली थी मै। जिसको मैंने साथी समझा, उसी के द्वारा छली थी मै। इधर से अब न्याय मांगने, शव शैया पर लेटी हु मै। दहेज़ के लोभी इस संसार में दहेज़ की भेट चढ़ी हु मै।

 उम्मीद करती हु की मेरी बातो को समझने के बाद हर माता-पिता ये कसम ले की न दहेज लेंगे न देंगे। दहेज लेकर या देकर रिश्तो और इंसानो का सौदा न करे। इस बात की सपथ ले की बेटी के लिए दहेज़ देने से अच्छा उसे आत्मनिर्भर बनाएंगे। महिला दिवस पे इससे  बड़ा तौफा एक महिला के लिए कुछ नहीं हो सकता। अपनी राय कमेन्ट में जरूर दे।    

By Aditi Neha

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San
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San

Very nice Aditi sach me ek aurat bahut jimmedari nibhati hai phir bhi log use uchit Samman nahi dete Sacha women day us din hoga jab har Insan auirat ki respect karega

Kum
Guest
Kum

Nice line. Very touching post…good work

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