Sep, 22, 2019
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जलियांवाला बाग हत्याकांड क्या है? जाने क्या हैं इसका इतिहास?

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Education Desk : जलियावाला बाग हत्याकांड एक ऐसी दिल दहला देने वाली घटना है जिसके बारे में सुनकर आज भी हमारे आँखे नम हो जाती है।यह घटना भारत के इतिहास का सबसे कुरुरतम घटना। यह घटना 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन 20 हजार भारत के वीरपुत्रों ने अमृतसर के जलिया वाले बाग में स्वाधीनता का यज्ञ रचा था। इस बाग में 13 अप्रैल 1919 को बच्चे, बूढ़े, आवला सभी मौजूद थे और सबो ने एक साथ मिलकर स्वाधीनता की मांग की थी। जिस मांग को सुनकर अंग्रेजो ने अपना आपा खो दिया था और लगातार 15 मिनटों तक अंधाधुन गोलियों की बौछार की थी। 

यह बाग चारो और से ऊंची-ऊंची दीवारों से घिरा हुआ था और बाहर निकलने के लिए बस एक छोटा सा दरवाजा था। उसी द्वार पर उस नीच अंग्रेज अधिकारी जनरल डायर ने मशीनगन लगवा दी थी। जब तक उस मशीनगन में गोली थी गोलियों की बौछार जारी रही। सरकारी समाचार के मुताबिक इस घटना में 400 व्यक्ति मारे गए थे और 2000 व्यक्ति घायल हुए थे। इस घटना से बचने के लिए कई लोगो ने वहा स्थित कुए में कूद परे थे। मृतकों और घायलों को उन दुस्टो ने रातभर वैसे ही तड़पते छोर दिया था, मलहम पट्टी तो दूर की बात थी उन लोगो को पानी तक नहीं दिया गया। 

जब कुए से मृतकों को निकला गया तो लगभग 150 शव बाहर निकले गए। इस प्रकार इस कुए को मृतकूप की संज्ञा दी गई। इस घटना को अंजाम देने के बाद हत्यारे को थोड़ी सी भी शर्म नहीं आई और वह खुद पर गर्व करता था। इस घटना को बीते आज 100 साल पूरा हो गया। 

इस कांड के हत्यारे जनरल डायर ने हंटर कमीशन के सामने बड़ी ही निडरता और गर्व से यह स्वीकार किया और कहा – मैंने भीड़ हटाने की कोई कोशिश नहीं की और वहा उपस्थित लोगो पर गोलियों की बौछार कर दी, मैंने कुल 1650 गोलिया चलाई और सबको मौत के हवाले किया। मै चाहता तो मै आसानी से इस भीड़ को काबू में कर हटा सकता था। लेकिन मैंने जानबूझकर गोलिया चलाई और मौत का यह खेल खेला। बाद में भी मैंने की मृतकों या घायलों के लिए किसी तरह का प्रबंध नहीं किया।”जनरल डायर के इस क्रूरता को पंजाब के शाशक सर माइकेल ने न सिर्फ उचित ठहराया अपितु तार द्वारा उसकी प्रसंशा भी की थी।   

1857 के बाद गोरी सरकार के अधीन में यह सबसे बड़ी और दर्दनाक अत्याचार यह गोलीकांड ही था। इस अत्याचार के बाद भी इन राक्षसों का अत्याचार ख़त्म नहीं हुआ था, बाकि बचे अमृतसर के वासियो के लिए पानी और बिजली की व्यवस्था भी छीन ली थी और रेल यात्रा का तीसरी श्रेणी की टिकट बंद कर दिया। साथ ही भारत के नागरिको को खुले सड़को पर कोरे की बरसात करता था और अत्यंत तकलीफ पहुँचता था। 

इस हत्या कांड में वीर उधमसिंघ के पिता भी मारे गए थे। जिनका बदला लेने के लिए वीर उधमसिंघ लन्दन गए और वहा जब डायर अपने द्वारा भारतवासियो पर किए गए अत्याचार का भाषण दे रहा था, तब वीर उधमसिंघ ने अपने पिस्तौल से उस नीच डायर को मार डाला। डायर को मारने के जुर्म में उन अंग्रेजो ने वीर उधमसिंघ को फांसी दे दी थी। 

लेकिन वीर उधमसिंघ द्वारा यह वीरता अत्यंत ही सराहनीय है जिस तरह से पिता और भारतवासियो पर किए गए अत्याचार का बदला लिया वह कबीले तारीफ है। हम सब दिल से उन्हें और इस घटना में शहीद हर भारतवासी और तमाम उन व्यक्तियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते है जिन्होंने देश के लिए क़ुरबानी दी।   

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